लेखक: पुनीत कुमार
पिछले सोमवार मैंने अपनी ज़िंदगी में एक ऐसा फैसला लिया, जो आज के ज़माने में हवा रोकने जैसा लगता है।
मैंने अपने फोन से Instagram, Facebook, Twitter (X), TikTok, YouTube, Netflix — मतलब हर वो ऐप हटा दिया जो हमें बिना सोचे स्क्रोल करवाता है।
कोई “ब्रेक” नहीं।
कोई “सिर्फ कम इस्तेमाल” नहीं।
पूरी तरह डिलीट। पूरे 7 दिन के लिए।
मुझे लगा था कि बस थोड़ा समय बचेगा।
लेकिन जो मिला, वो मेरे दिमाग की एक छुपी दुनिया थी — और एक डरावनी सच्चाई कि ये ऐप्स हमें क्यों छोड़ना नहीं चाहते।
दिन 1–2: मोबाइल की तलब (Digital Itch)
पहले दो दिन बहुत अजीब थे।
बार-बार मेरा हाथ अपने आप जेब की तरफ जाता।
स्क्रोल करने की आदत हवा में उंगलियां चलाने लगी।
शांति अजीब तरह से शोर करने लगी।
लाइन में खड़ा हूँ, लेकिन फोन नहीं।
बाथरूम में बैठा हूँ, लेकिन रील नहीं।
ये बोरियत नहीं थी।
ये लत का असर था।

दिमाग के साथ क्या होता है?
हर नोटिफिकेशन हमारे दिमाग में डोपामिन छोड़ता है।
डोपामिन खुशी का नहीं, बल्कि चाहत का केमिकल है।
मतलब:
“क्या आया होगा?”
“लाइक होगा या मैसेज?”
ये ठीक वैसा है जैसे जुआ मशीन —
इनाम नहीं, इनाम की उम्मीद हमें बांधे रखती है।
ऐप्स हमें कंटेंट नहीं देते,
वो हमें इंतज़ार देते हैं।

दिन 3: दिमाग का खुलना (The Great Unclenching)
तीसरे दिन कुछ बदला।
जैसे दिमाग में हमेशा चलने वाली “भूं-भूं” की आवाज़ बंद हो गई।
पहली बार मैंने असली बोरियत महसूस की।
और उसी खालीपन में:
• दीवार पर पड़ती रोशनी दिखी
• चाय का असली स्वाद महसूस हुआ
• अपनी सांसों की आवाज़ सुनी
ये है दिमाग का Default Mode Network —
जहाँ सोच, कल्पना और आत्म-समझ पैदा होती है।
सोशल मीडिया इस हिस्से को चुप कर देता है।
टेक कंपनियों की सच्चाई: अपने बच्चे दूर क्यों रखते हैं?
क्या आप जानते हैं?
• Steve Jobs अपने बच्चों को iPad कम इस्तेमाल करने देते थे
• Apple के CEO Tim Cook अपने भतीजे को सोशल मीडिया से दूर रखते हैं
• Facebook के पूर्व VP ने कहा:
“हमने समाज को तोड़ने वाले डोपामिन लूप बनाए हैं”
सवाल: अगर ये इतना अच्छा है,
तो ये लोग अपने बच्चों को क्यों नहीं देते?
क्योंकि उन्हें कोड का सच पता है।
तीन खतरनाक चीज़ें जो एल्गोरिदम करता है
1.भावनाओं से खेल
Facebook का एक्सपेरिमेंट साबित करता है —
आपकी फीड बदलकर आपका मूड बदला जा सकता है।
2. सोच को दिशा देना
जो आप देखते हैं, वही आप सोचने लगते हैं।
गुस्सा दिखाओ → और गुस्सा मिलेगा।
3. नकली दुनिया
हर इंसान को अलग इंटरनेट मिलता है।
एक ही चीज़ खोजो, लेकिन जवाब अलग।
आप इंटरनेट पर नहीं,
एक बनावटी दुनिया में रहते हैं।
दिन 4–7: असली दुनिया में वापसी
समय वापस आया
एक घंटा सच में एक घंटा लगा।
स्क्रोल में गायब नहीं हुआ।
काम में ध्यान
मैंने गाना सुना — सिर्फ सुनने के लिए।
किसी दोस्त को कॉल किया — रिएक्ट नहीं, बात की।
तुलना बंद
कोई और क्या कर रहा है, कहाँ घूम रहा है —
ये सब बंद।
मन ज़्यादा नरम और शांत हो गया।

अपने दिमाग से मुलाकात
डर, आइडिया, यादें —
सब उभरने लगीं।
पहले डर लगा,
फिर आज़ादी महसूस हुई।
7-Day Digital Mindfulness Plan (आप भी कर सकते हैं)
1. सभी ऐप हटाएं (7 दिन)
सिर्फ ज़रूरी काम ब्राउज़र से, टाइमर लगाकर।
2. खालीपन के लिए प्लान
• किताब
• डायरी
• टहलना
• किसी दोस्त से कॉल
3. तलब को देखें, भागें नहीं
खुद से पूछें:
“अभी मैं क्या महसूस कर रहा हूँ?”
4. सुबह-शाम पवित्र बनाएं
• सुबह बिना न्यूज़
• रात बिना Netflix
5. वापसी सोच-समझकर
हर ऐप का कारण तय करें।
“टाइम पास” कारण नहीं है।
आपको क्या मिलेगा?
a.ध्यान पर कंट्रोल
b.एल्गोरिदम से आज़ादी
c. बेहतर फोकस
d. असली माइंडफुलनेस
निष्कर्ष: सबसे बड़ी आज़ादी
7 दिन तक मैं:
• कोई डेटा नहीं था
• कोई एंगेजमेंट नहीं
• सिर्फ एक इंसान था
सोशल मीडिया हमें ये महसूस कराता है कि
उसके बिना हम अस्तित्वहीन हैं।
लेकिन सच्ची शांति वहीं मिलती है
जहाँ कोई लाइक नहीं,
कोई शेयर नहीं,
सिर्फ ज़िंदगी होती है।
आज के दौर में सबसे बड़ा ध्यान-योग है:
कुछ समय के लिए गायब हो जाना।
एल्गोरिदम इंतज़ार करेगा।
लेकिन सवाल ये है —
क्या आप अपने दिमाग का स्वाद भूल जाएंगे?
Author Bio
मैं पुनीत कुमार एक स्वतंत्र हिंदी लेखक हूँ जो एक डिजिटल अवेयरनेस कंटेंट क्रिएटर भी हूँ।मैं टेक्नोलॉजी, माइंडफुलनेस और समाज से जुड़े विषयों पर सरल भाषा में लिखता हूँ ताकि आम लोग डिजिटल दुनिया को समझ सकें और उस पर नियंत्रण पा सकें।Read more ….

